क्या इंसाफ है तेरा भी ऐ खुदा 
अपने गुनाहों का जुर्माना पूछा था 
देना था तो बैराग ही दे देता 
क्यों बेवजह इश्क़ की राह थमा दी ?

2 comments:

Dhruv Singh said...

वाह ! बहुत खूब ,सुंदर रचना

राकेश कुमार श्रीवास्तव राही said...

सुंदर भावाभिव्यक्ति रीतू जी।
सादर आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों --
लिंक है : http://rakeshkirachanay.blogspot.in/

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