तुम सा फ़रिश्ता



जब जिंदगी रूठ जाया करती हैं हमसे 
बिछड़ जाती हैं राहें और मुँह फेर लेते हैं लोग 

अंधेरों में जब मेरे ही अपने दो साए होते हैं 
उस बेरहम वक़्त में अपने भी पराये होते हैं 

अपनों  से लगने वाले बेगानों की भीड़ में 
कभी एक बेगाना अपना बन हाँथ थाम लेता है  

अंधेरों से भरी राहों में जब डूबने लगती हैं सासें 
उबरने को रौशनी का एक तिनका ही काफी हुआ करता है 

किस्मत वालों को मिलता है तुम सा फ़रिश्ता उन अँधेरी राहों  में 
जो बनके दोस्त भर जाता है रौशनी बुझे चरागों  में 

5 comments:

अजय कुमार झा said...

आपकी कमाल की पोस्ट का एक छोटा सा कतरा हमने सहेज़ लिया ब्लॉग बुलेटिन के इस पन्ने को सज़ाने और दोस्तों तक आपकी पोस्ट को पहुंचाने के लिए , आइए मिलिए अपनी और अपनों की पोस्टों से , आज के बुलेटिन पर

Ritz said...

Aapka Bahut Bahut Shukriya Ajay Ji ...

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन भाव ... बहुत सुंदर रचना....

Ritz said...

Bahut Bahut Shukriya Sushma Ji !!

मदन मोहन सक्सेना said...

बहुत उत्कृष्ट अभिव्यक्ति.हार्दिक बधाई और शुभकामनायें!
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

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