मेरी मंजिल की राह ..



मेरा दिल ले जाए जहाँ बस वहीँ मंजिल मेरी

मिलते रहेंगे इस सफ़र में हर मोड़ पे हमसफ़र कई

हर किस को मंजिल की तलाश और रास्तों की कमी नहीं

चलते चलते जो हो जाए साँझ कभी कहीं

थामना पड़ेगा एक रात को बस उसी मोड़ पे वहीँ

ये ठहराव सिर्फ एक पल का है जिंदगी कभी थमती नहीं

लगता है जैसे कभी मिलेगी मंजिल मुझे खुद में

इसलिए खुद को समझना ही मेरी मंजिल की राह है

इस राह में चलने वाले हमसफ़र की तलाश है

5 comments:

Atul Shrivastava said...

'मेरा दिल ले जाए जहाँ बस वहीं मंजिल मेरी...'
अच्‍छे भाव। अच्‍छी प्रस्‍तुति।
शुभकामनाएं आपको।
आप मेरे ब्‍लाग में आकर इस दिलचस्‍प रपट को पढिए। आपके कमेंट के इंतजार में...
http://atulshrivastavaa.blogspot.com/2011/03/blog-post_26.html

Atul Shrivastava said...

आप अपने ब्‍लाग से शब्‍द पुष्टिकरण हटा लें, इससे टिप्‍पणी करने वालों को आसानी होगी।

अजय कुमार झा said...

सुंदर सरल रचना । शुभकामनाएं आपको

AbBy said...

super kewl ... loved it ...

Prashant said...

humsafar ka achcha vivaran hai .. is kavita mein.. achchi soch ki achchi prastooti.

www.coffeefumes.blogspot.com

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