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तितलियाँ

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मचलती हैं मन में हज़ारों तितलियाँ  वहम ही सही तुमने मुझसे इश्क़ तो किया

खो गया है बचपन

खो गया है कहीं तो बचपन  ढूँढने निकला उसे उन गलियों में  आंकने को ज़मी नहीं मिली  तराशने को आसमाँ न मिला  रौंद रहे थे एक दुसरे के साये भी एक दूसरे को  पैर फसा मैं गिरा, रास्तों पे गढ्ढे तक दिखते नहीं  क्या नन्हे क़दमों को मिलेगा रास्ता चलने को  या हवा में रस्ते बन चुके होंगे कहीं  खो गया है कहीं तो बचपन  बहुत ढूँढने पे उन गलियों में  खो गया है  बचपन   कहीं   ढूँढने निकला उसे उन गलियों में  आंकने को ज़मी नहीं मिली  तराशने को आसमाँ न मिला  रौंद रहे थे हमारे साये भी एक दुसरे को  मैं उलझा गिरा, कोई हाँथ न बढ़ा उठाने को  चलने को एक ठीक ठाक सी गली भी न मिली  क्या नन्हे क़दमों को मिलेगा रास्ता चलने को  सुना है आजकल भीड़ बहुत है आसमान में  लगता है वहीँ गया है घूमने हवा की गलियों में   जला न दे सूरज की आँच उसे  लग न जाए बादलों की ठोकर कहीं  ले न जाए उसे कोई उड़ा कहीं ,  मुझे भी बता दो रास्ता आसमां तक जाने का  खो गया है...

एक दुआ मेरी ...

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मांगी है दुआ सभी यार दोस्तों के लिए  खुदा-ए -रहमत बरसे उनके घर पे  दिलों में जज़्बा हो दिलों में जूनून हो  अल्लाह उनके सारे ख्वाब पूरे करे अमन और सुकून हो पूरी दुनिया में   बस यही दुआ मेरी हर इबादत में रहे.  सभी दोस्तों को ईद मुबारक़  !!! 

तुम सा फ़रिश्ता

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जब जिंदगी रूठ जाया करती हैं हमसे  बिछड़ जाती हैं राहें और मुँह फेर लेते हैं लोग  अंधेरों में जब मेरे ही अपने दो साए होते हैं  उस बेरहम वक़्त में अपने भी पराये होते हैं  अपनों  से लगने वाले बेगानों की भीड़ में  कभी एक बेगाना अपना बन हाँथ थाम लेता है   अंधेरों से भरी राहों में जब डूबने लगती हैं सासें  उबरने को रौशनी का एक तिनका ही काफी हुआ करता है  किस्मत वालों को मिलता है तुम सा फ़रिश्ता उन अँधेरी राहों  में  जो बनके दोस्त भर जाता है रौशनी बुझे चरागों  में 

गुरु नाम ....

हर रूप में तुम्हें  मैंने पाया है  बचपन में माता-पिता कह कर पुकारा  पाठशाला में तुम्हे अपना शिक्षक पाया है  दोस्तों में भी तुम्हारे अस्तिस्त्व का अहसास  जिंदगी में मिले हर इंसानी साए में  तुम्हारे रूप का आभास समाया है  मासूम से दिल की ख्वाहिशों में  तुम्हे जीवन के रंग भरते पाया है  मेरी धड़कन में प्यार के अहसास से  अपने आप को तुम्हारी पनाहों में पाया है  तुम्हारी हर रूप में मौजूदगी ने  मुझे इस भवसागर से पार लगाया है  वेदों में भी तुम पूजे जाते हो  इस जग ने अनेकों रूप में भी  गुरु नाम से तुम्हे बुलाया है  तुम्हारी आराधना में मेरे ईश्वर  मैंने समर्पण और श्रधा का भाव पाया है  उसी श्रधा भाव के कुछ पुष्प पिरोकर ये भाव आज मैंने शब्दों में सजाया है 

तुम मेरे पास हो ....

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तन्हाई मैं भी तुम मेरे पास हो भीड़ में भी एक ख्याल बन आस पास हो जब भी गुजरें हम उन गलियों से आज भी तुम वहाँ करते हमारा इंतज़ार हो ठहरा है आज भी हर एक पल वहां जैसे जिंदगी बाँध ली वक़्त ने संग अपने  मैं जिंदगी के साथ आगे बढ़ तो गयी पर साँसें जैसे उन्ही पलों में थम के रह गयीं तुम ही बताओ की क्या कहूं मैं कि किस दौर मैं जी रही हूँ कहने को तो जिन्दा ही हूँ पर धडकनों मैं कोई जज़्बात नहीं है अब तुम ही बताओ कैसे कहूं मैं की मुझे तुमसे प्यार नहीं है

साथ बीता दो लम्हों का सफ़र.....

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साँसे उलझी उलझी सी अंखियों मैं नमी नमी सी जाने कौन अजब सी बात की हम अब तक उन्हें भूले नहीं कभी हंसूं नाम आँखों से तो कभी गम में भी मुस्काऊँ किस राह चल के जाऊं की तेरे कदमों के निशां पा जाऊं जिंदगी के रास्ते अनजाने कभी एक पल को दिल सहमे ऐसे जैसे मेरे जीवन से साँसों की डोर रूठ गयी साथ बीता दो लम्हों का सफ़र और कुछ इस तरह की हम तेरे हर पल के एह्सास के हमसफ़र बन कर रह गये  इस सफ़र में तेरी खुशबु बिखर रही थी मेरे जहन में हौले से की अचानक एक दिन जिंदगी जुदा राहों पे बिन बताये मुड गयी न देख पाए और न कह सके हम तुमसे अलविदा एक बार पीर इतना की बस दिल चीर अँखियाँ से नीर धरा बह गयी   चाहा जुबान ने कुछ कहना पर ये धारा लफ़्ज़ों को बहा ले गयी अब सुबह से शाम तलक तेरे क़दमों के निशान खोजा करते हैं रातों को सितारों से तुझ तक पहूचाने की मिन्नतें किया करते हैं सदियों तलक बस एक आस में यूँ ही बीत रहे हैं सारे लम्हे   की कभी तो गुजरेगा तू उन्ही जुदा राहों फिर से एक बार  मेरा दिल जो अब तक धड़कता है ते...